सोमवार, 21 मार्च 2011

आधी आबादी और मेरे चित्र

डा. लाल रत्नाकर

दुनिया जिसे आधी आबादी कहती है वही आधी आवादी मेरे चित्रों की पूरी दुनिया बनती है.

यही वह आवादी है जो सदियों से संास्कृतिक सरोकारों को सहेज कर पीढ़ियों को सौंपती रही है वही संस्कारों का पोषण करती रही है. कितने शीतल भाव से वह अपने दर्द को अपने भीतर समेटे रखती है और कितनी सहजता से अपना दर्द छिपाये रखती है. कहने को वह आधी आबादी है लेकिन षेश आधी आबादी यानी पुरूशों की दुनिया में उसकी जगह सिर्फ हाशिऐ पर दिखती है जबकि हमारी दुनिया में दुख दर्द से लेकर उत्सव-त्योहार तक हर अवसर पर उसकी उपस्थिति अपरिहार्य दिखती है जहां तक मेरे चित्रों के परिवेश का सवाल है, उनमें गांव इसलिए ज्यादा दिखाई देता है क्योंकि मैं खुद अपने आप को गांव के नजदीक महशूस करता हूॅं सच कहूॅ तो वही परिवेश मुझे सजीव, सटीक और वास्तविक लगता है. बनावटी और दिखावटी नहीं. 
बार-बार लगता है की हम उस आधी आवादी के ऋणी हैं और मेरे चित्र उऋण होने की सफल-असफल कोशिश भर है.

नारीजाति की तरंगे-

मेरे चित्रों की ‘नारीजाति की तरंगे’ शीर्षक से इन दिनों एक चित्र प्रदर्शनी ललित कला अकादमी, रवीन्द्र भवन की कलादीर्घा 7 व 8 में 19 मार्च 2011 तक चलेेंगी, प्रदर्शनी प्रातः 11 बजे से सायं 7 बजे तक खुली रहती है। 
इस चित्र प्रदर्षनी में नारीजाति की तरंगे विषय को केन्द्र में रखकर चित्रों का चयन करके उन्हें प्रदर्शित किया गया है जिनमें भारतीय नारीजाति की विविध आयामी स्वरूपों का दृश्याकंन किया गया है जिनमें-यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है जिनमें जिस रूप में स्त्रियां जन्म से लेकर अब तक आकर्शित, प्रभावित और उत्प्रेरित करती आयी हैं परंतु इनकी अपनी व्यथा है जो पढ़ना बहुत ही सरल होता है. आप मान सकते हैं कि मैं पुरुषों को उतनी आसानी से नहीं पढ़ पाता हूं । मैने बेशक स्त्रियों को ही अपने चित्रों में प्रमुख रुप से चित्रित किया है, क्योकि मुझे नारी सृजन की सरलतम उपस्थिति के रूप में परिलक्षित होती रहती है कहीं कहंी के फुहड़पन को छोड़ दंे तो वे आनन्दित करती आयी हैं जिसे हम बचपन से पढ़ते सुनते और देखते आए हैं यदि हम यह कहें कि नारी या श्रृंगार दोनों में से किसी एक को देखा जाए तो दूसरा स्वतः उपस्थित होता है ऐसे में सृजन की प्रक्रिया वाधित नहीं होती वैसे तो प्रकृति, पशु, पक्षी, पहाड,़ पठार और पुरूश कभी कभार बन ही जाते हैं. परन्तु शीतलता या सुकोमल लता के बदले किसी को चित्रित किया जा सकता है तो वह सम्भवतः नारी ही है.
मेरी स्त्रियां सीता नहीं हैं कृश्ण की राधा नहीं है और न ही रानी लक्ष्मीबाई हैं ये स्त्रियां खेतों खलिहानों में अपने पुरूषों के साथ काम करने वाली जिन्हें वह अपना राम और कृष्ण समझती हैं लक्ष्मीबाई जैसे नहीं लेकिन अपनी आत्म रक्षा कर लेती हैं वही मुझे प्रेरणा प्रदान करती हैं।
मेहनतकश लोगों की कुछ खूबियां भी होती हैं जिन्हें समझना आसान नहीं है यदि उन्हें चित्रित करना है तो उनके मर्म को समझना होगा उनके लय उनके रस के मायने जानना होगा, उनकी सहजता उनका स्वाभिमान जो पूरी देह को गलाकर या सुखाकर बचाए हैं दो जून रूखा सूखा खाकर तन ढक कर यदि कुछ बचा तो धराउूं जोड़ी का सपना और सारी सम्पदा समेटे वो जैसे नजर आते हैं वैसे होते नहीं उनका भी मन है मन की गुनगुनाहट है जो रचते है अद्भूद गीत संगीत व चित्र जिन्हें लोक कह कर उपेक्षित कर दिया जाता है उनका रचना संसार और उनकी संरचना मेरे चित्रों में कैसे उपस्थित रहे यही प्रयास दिन रात करता रहता हूं. उनके पहनावे उनके आभूषण जिन्हें वह अपने हृदय से लगाये रात दिन ढ़ोती है वह सम्भव है भद्रलोक पसन्द न करता हो और उन्हें गंवार समझता हो लेकिन इस तरह के आभूषण से लदी फदी स्त्रियां उस समाज की भद्र मानी जाती है ये भद्र महिलाएं भी मेरे चित्रों में सुसंगत रूपों में उपस्थित रहती हैं मेरे ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने मतलब यह नहीं है कि मैं और भी विषय का वरण अपनी सृजन प्रक्रिया के लिये नहीं कर सकता था पर मेरे ग्रामीण परिवेश ने मुझे पकड़े रखा ऐसा भी नहीं मैंने छोटी सी कोशिश भर की है उनको समझने की।

जिस स्त्री का मेरी कला से सरोकार है मूलतः वह रंगों के प्रति सजग होती है उसे प्रारम्भिक रंगो से गजब का लगाव है जिन्हे वह सदा वरण करती हैं,मूलतः ये मूल रंग इनके मूल में बसे होतेे हैं यथा लाल पीला नीला बहुत आगे बढ़ी तो हरा बैगनी और नारंगी इसके सिवा उसके जीवन में जो रंग दिखाई देते हैं वह सीधे सीधे कुछ अलग ही संदेष सम्प्रेषित करते हैं इन रंगो मे प्रमुख हैं काला और सफेद जिनके अपने अलग ही पारम्परिक सन्दर्भ हैं .
इन रंगो के साथ उसका सहज जुडाव उसे प्रकृति और सत्य के समीप रखता है, उत्सव एवं पारम्परिक मान्यताएं भी इन चटख रंगो को अंगीकृत करते हैं।
आज के बदलते दौर में हमारी स्त्री उतनी प्रभावित नहीं हो रही है, लेकिन अगली पीढ़ी सम्भव है तमाम बदलते सरोकारों को स्वीकारे लेकिन निकट भविष्य में मूलतः जो खतरा दिखाई दे रहा है वह यह है कि इस आपाधापी में उसकी अपनी पहचान ही न खो जाए.समकालीन दुनिया के बदलते परिवेष के चलते आज बाजार वह सामग्री परोस रहा है जो उस क्षेत्र तो क्या उस पूरे परिवेश तक की वस्तु नही है इसका मतलब यह नही हुआ कि मैं विकास का विरोधी हूं लेकिन जिन प्रतीकों से मेरा रचना संसार समृद्ध होता है उसमें आमूल चूल परिवर्तन एक अलग दुनिया रचेगा जिससे सम्भवतः उस परिवेश विशेष की निजता न विलुप्त हो जाए।

सहज है वेशकीमती कलाकृतियां समाज या आमजन के लिए सपना ही होंगी मेरा मानना इससे भिन्न है जिस कला को बाजार का संरक्षण मिल रहा है उससे कला उन्नत हो रही है या कलाकार सदियों से हमारी कलायें जगह जगह विखरी पड़ी हैं अब उनका मूल्यांकन हीे भी तो उससे तब के कलाकारों को क्या लाभ. आज भी जिस प्रकार से बाजार कला की करोड़ो रूपये कीमत लगा रहा है बेशक उससे कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है वह उत्साहित होता है लेकिन यह खोज का विषय है कि यह करोड़ो रूपये किन कलाकारों को मिल रहे हैं. कम से कम समाज ने तो इसे सुन सुन कर कलाकार को सम्मान देना आरम्भ कर दिया है कल तक जहां कला को कुछ विशेष प्रकार के लोगों का काम माना जा रहा था आज हर तबके के लोग कलाकार बनने की चाहत रखते हैं इससे कलाकार की समाज में प्रतिष्ठा बढ़ी है।

मंगलवार, 1 मार्च 2011

सहारनपुर यात्रा-

सहारनपुर के जे वी जैन महिला महाविद्यालय में बाह्य परीक्षक के रूप में जाना हुआ 
जहां चित्रकला की विभागाध्यक्ष डॉ मधु जैन थीं।


उन दिनों विश्वविद्यालय में चित्रकला को लेकर कुछ सुधार पाठ्यक्रम में किए गए थे जब प्रैक्टिकल वर्क के लिए वाह्य परीक्षक को पूरी परीक्षा में रहना था आमतौर पर इससे पहले वाह्य परीक्षक अंतिम दिन आता था और नंबर देकर चला जाता था।

विश्वविद्यालय में कई बड़े परिवर्तन हो रहे थे जिसमें एक बड़ा परिवर्तन यह हुआ था कि चित्रकला विषय को मूल चूल रूप से परिवर्तित कर दिया गया था और और अब तक के 60 और 40 के रेशियो को बदलकर 20 और 80 पर ला दिया गया था यानी 20 नंबर का प्रैक्टिकल और 80 नंबर की थ्योरी। चौधरी चरण विश्वविद्यालय के सभी महाविद्यालय में इस बात को लेकर बहुत आक्रोश था कि जिन लोगों ने इस तरह की व्यवस्था की थी वह कलाकार सत्यानाश करना चाहते थे। 

इस आंदोलन में मैं भी बढ़कर भाग लिया था और विश्वविद्यालय के कुलपति उन दिनों डॉ  ओझा साहब हुआ करते थे जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से आए थे हमारा एक डेलिगेशन उनसे मिला और उन्होंने उसे कमेटी को फिर से गठित किया जिसमें मुझे भी रखा गया। 

इस कमेटी के द्वारा हम लोगों ने पाठ्यक्रम को ललित कला विभागों की तरह समृद्ध करने की कोशिश की जिसका एक पक्ष यह भी था की परीक्षा को ठीक से कराया जाए और विद्यार्थियों के हुनर का मूल्यांकन सही हो।
अब सवाल यह था कि ऐसे परीक्षक कहां से ले जाएं जो इतने समय तक महाविद्यालयों में रहकर यह कार्य कर सकें। इस समस्या से सभी महाविद्यालय जूझ रहे थे और भरपूर विरोध के साथ-साथ अनदेखी भी कर रहे थे। 
मुझे लगा कि मुझे अवसर मिला है तो मैं इसको प्रायोगिक तौर पर पूरा करता हूं इसलिए मैं इस बात पर तैयार हुआ कि मैं परीक्षा के पूरे दोनों सहारनपुर ही रहूंगा वहां की विभाग अध्यक्ष को बहुत समस्या हुई कि मैं कहां रुकूंगा कैसे चार दिनों तक यह सिलसिला चलता रहेगा। 

मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि आप इसकी चिंता ना करें मैं अपनी व्यवस्था कर लूंगा।
हालांकि हमारे वरिष्ठ साथी जो बी एच यू के ही प्रोडक्ट थे डॉ राम शब्द सिंह उनके साथ रख सकता था लेकिन मैं और इंतजाम किया और स्वतंत्र रूप से सहारनपुर में चार दिन रहा और महाविद्यालय जाकर विद्यार्थियों की परीक्षा में सहयोग करता रहा। 

इस बीच कई घटनाएं घटी जिनका जिक्र यहां जरूरी नहीं है।
उसी समय के यह चित्र है -


इस बीच कई घटनाएं घटी जिनका जिक्र यहां जरूरी नहीं है।
जबकि सच्चाई यह है की उच्च शिक्षा के लेबल को किसी भी कालेज में मेन्टेन ही नहीं किया जाता रहा है। 

उत्तर प्रदेश में कला शिक्षा 
(पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सन्दर्भ में)

डॉ लाल रत्नाकर

                         उत्तर प्रदेश में कला शिक्षा पर बात की जाय इससे पहले हमें राष्ट्रीय तल पर कलाओं की दशा दिशा को समझना आवश्यक होगा, जिससे हम कला की शिक्षा की प्रासांगिकता और उसके शैक्षिक स्वरुप पर भी प्रकाश डाल पाएंगे, अब आवश्यक ये है की कला की शिक्षा का इतिहास देखा जाय या आज की कला शिक्षा। .......... 

                   इसीलिए पहले हमें भारतीय कलाओं के क्रमिक विकास के परिदृश्य को समझना होगा, जैसा कि सर्वज्ञात है कि सदियों से कला जगत का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। अतः जब भी किसी तरह के विकास की बात होगी और उनमें कला के विकास अवधारणओं की चर्चा हो या नहो फिर भी कलाओं की उपस्थिति तो अनिवार्य होगी ऐसे में भारत के सम्पूर्ण कला विकास को नजरअंदाज करना बेमानी ही होगा। यहां यह नहीं कहा जा सकता कि कलाओं के वर्गीकरण के पूर्व जो कलात्मकता आज इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है वह सहज आ जाती रही होगी अपितु उसके ज्ञान को देने की प्रविधियों को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता। कलाओं के समय समय की प्रगति एवं अवरोध इस प्रभावी भावना के निष्पादन में कालचक्र का अपना महत्व होता है अतएव इसमें उनकी दुरूहता जितनी भी आड़े आयी हो उससे उसकी रचना प्रक्रिया के कौशल को कमतर करके देखना हो सकता है आज प्रासांगिक न हो पर इसके रचना के कौशल ने कभी अपने को समाप्त नहीं होने दिया है, ज्ञान के इस अद्भुत स्वरूप पर मनीषियों की दृष्टि सम्भव है बहस को स्थान दिया हो पर रचना प्रक्रिया की जटिलता को जिन रचनाकारों ने गौरवशाली बनाया वास्तव में वास्तविक योगदान उनका है। 

                    उत्तरोत्तर नकारात्मक रवैये को यदि त्यागते हुए वैश्विक कला इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह तथ्य करीने से प्रमाणित होते हैं कि धर्म समाज और राज्य कला विकास की प्रक्रिया को जितना प्रभावित करते हैं उससे कहीं ज्यादा रचनाकार का कौशल। विज्ञान, साहित्य एवं परम्पराएं जब जब धर्म और समाज के पक्ष और प्रतिपक्ष में आती हैं तो उदारता अनुदारता अनिवार्य रूप से कलाओं की रचनात्मकता को प्रभावित करती हैं। यहां शिक्षा का महत्वपूर्ण स्वरूप भी सहज ही सम्मुख आता है जब हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं। इस अप्राकृतिक प्रक्रिया के चलते मौलिक प्रक्रिया के विस्तार की वजाय प्रतिरूपण और अलंकारिकता के वैभव का ही विस्तारित कला का स्वरूप ही अधिक प्रचलित हो पाया, यही कारण है कि कलाएं सामाजिक स्वरूप में स्वीकार्य तो रहीं पर उतनी विकसित न हो पाने का कारण कहीं न कहीं असमानता और मानसिक दिवालियेपन की कहानी कहती नजर आती हैं। यदि यह सब व्यवस्थित और उनमुक्त मौलिकता की स्थिति में होता तो भारतीय कला का गौरवशाली स्वरूप इतिहास के ही नहीं वर्तमान में भी दुनिया को दिशा देता। 

                     इतिहास के गर्भ में पल रहे भारत का कला वैभव विखरा पड़ा है, ठीक उसी तरह जैसे यहां का सामाजिक स्वरूप। जब भी हम इसका विस्तार और निरपेक्ष अध्ययन करेंगे तो अनोखा सच सम्मुख आएगा। इन्हीं विविधताओं को समेटे यहां का गौरवशाली समाज सदियों की मानसिक गुलामी एवं बदहाली में डूबा यह महान रचनाकार अपनी सीमाओं में सिमटा, देश की अनन्य बाधाओं, हमलों, लूट-खसोट और अराजकताओं के मध्य जो कुछ कर पाया वह यहां के साम्राज्यों मठाधीशों की जागिर के रूप में महफूज है। वह अपनी कहानी इतिहास के पन्नों की जुबानी भले ही वयां न कर पाया हो पर किसी न किसी रूप में उसकी दशा पर जिक्र आ ही जाता है यथा ताजमहल जैसी विश्वविख्यात रचनाकार के हाथों के कलम कर दिये जाने के उद्धरण भी मौजूद हैं। यहां भी कलाकार की वास्तविक दशा के रूप में निश्चित तौर पर जो यातना जाहिर हो रही है कमोवेश यही दशा आज तक बनी हुई है। अतः भारत अपनी कलाओं के विविध स्वरूपों की वजह से अपनी पहचान बनाने में सम्पूर्ण संसार में कामयाब जरूर हो रहा है, पर उसके निहितार्थ अलग हैं। यही कारण है कि दुनिया के विविध देशों में भारतीय कलाएं आज चर्चा में ही नहीं उनकी मांग भी बनी हुई हैं पर यदि इनके समग्र विकास की प्रतिबद्धता भी पारदर्शी होती तो कुछ और बात होती। हो सकता है कि यह उल्लेख कष्टकारी और अव्यवहारिक लगे जो अपने आप में उक्त तथ्यों को ही बल प्रदान करेगा आज नहीं तो कल।    
  
                   फिर भी इतिहास बताता है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास की जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और उनमें में जितनी विधाएं यशस्वी हुई हैं, उनमें ललित कलाओं का महत्वपूर्ण स्थान एवं योगदान रहा है। भारत का हर युग अपने समय में किसी न किसी रूप में कलाओं को समेटे हुए है, यहां पर समुचित रूप से देखा जाय तो निश्चित रूप से कलाओं से पटा पड़ा है। पर दुखद है कि जितना   ध्यान जाना था वह सम्भवतः नहीं जा पाया है। वैसे तो भारत के गौरवशाली इतिहास में यह उल्लेख है कि समय समय पर इन विधाओं पर ध्यान रहा है, जिसके कारण कलाओं की स्थिति विविध संकटों के समय में भी कुछ न कुछ नूतन ही प्राप्त किया है। यही कारण है कि भारतीय समाज के सांस्कृतिक परिवेश में व्यक्ति को साहित्य, संगीत  और कलाओं के बिना पशुवत रूप में देखा जाता रहा हो वहां कला की महत्ता स्वतः समृद्ध हो जाती है, यथा उसे प्रमाणित करते हुए ये पंक्तियां उक्त अवधारणा को पुख्ता ही करती हैं- 

            साहित्य संगीत कला विहिनः। साक्षात् पशु पुक्छ विषाण हीनः।। 

                    यही कारण है कि भारतीय मानस कला रूपों को अपने जीवन के हर हिस्से में आभूषण के समान सजोकर रखा है शिलाखण्डों से लेकर देह तक का उपयोग इसके लिए किया गया है, भारतीय मानस का यही कला प्रेम विविध रूपों में प्रस्फुटित हुआ है, गीत संगीत नृत्य चित्र मूर्ति एवं स्थापत्य आदि में तथा दैनिक उपयोग की विविध सामग्रियां जिनमें आभूषणादि के अतिरिक्त नाना प्रकार के उपयोगिता की सामाग्रियों के अलंकारिक संसाधनों में ये विविध कला रूप प्रचुरता से प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि लोक और विशिष्ट में कला अभिप्रायों की तमाम समता दृष्टिगोचर होती है। जिसको कालान्तर में पुनः नवीनतम तरीके से सामंजस्य के साथ प्रयुक्त किया गया है। यहां प्रयुक्त कलात्मकता की विवेचना भी महत्व की है, जिसमें कालान्तर में बहुत परिवर्तन देखने को मिला है, यहां पर यह महत्वपूर्ण है कि जिन कलारूपों की रचना समाज को प्रतिविम्बित करती थी वह धीरे धीरे विलुप्त हो रही है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि सामाजिक पहचान में भी कलाएं बहुत सहयोगी थीं जो चुपचाप अपना काम करती रहती थीं। 

                    इन कला रूपों के निर्माण की प्रक्रिया में कला शिक्षा की प्रक्रिया पर गौर करें तो अधिकांश में परम्परागत गुरू-शिष्य या पारिवारिक परम्परा में यह कलाएं आगे बढ़ीं जिससे सांस्कृतिक सम्पन्नता आयीं जिसे हम अपने भारतीय समाज के विविध जातीय कार्यों के पेशेवर विविधता के रूप में भी देख पाते हैं। यही इनके सीखने के केन्द्र रहे हैं जो इन्हें परम्परा से पीढ़ी दर पीढ़ी इसके सम्पन्न स्वरूप प्रदान करते आए हैं। जितने भी उदाहरण मिलते हैं सबमें इन्हीं परम्परागत रूप से दी जाने वाली शिक्षा आज भी महत्वपूर्ण है। इसीलिए गुरू शिष्य परम्परा या घरानों के रूप में जिन्हें इसका सम्मान मिला वे इस विधा और ज्ञान के प्रसार में निश्चित रूप से समर्पित लोग थे। जिन्हें उनके कौशल की वजह से ही जाना गया। यही कारण है कि वो आज भी उन्हीं महत्वपूर्ण रूपों मे मौजूद है। 

                   इस परम्परा को आगे बढ़ाने और परवान चढ़ाने में जो कलाकार आगे आए उन्होने पीछे मुड़कर नहीं देखा, यथा कला के नये आयाम, नए प्रतिमान, नये मायने और नवीन तकनिकियों की खोजकर उनका भरपूर प्रयोग किए। यही कारण है कि समकालीन कला अपने विविध स्वरूपों में नजर आनी प्रारम्भ हुई। अब कला के मायने केवल और केवल पुरातन अर्थ समेटे रूपाकार न रहकर विविध अवस्थाओं व्यवस्थाओं को चिन्हित कर उनपर कलाकृतियों का सृजन हुआ। बृहत्तता और सूक्षमता का सामंजस्य एक साथ सामने आया, वसुदेव कुटुम्बकम की अवधारणा बलवती हुयी। चिन्तन की दिशा बदली, विषय बदले, माध्यम बदले। यही कारण है कि गुरू-शिष्य कहीं न कहीं मन्द पड़ी स्वतन्त्र विचारों का प्रसफुटन होना प्रारम्भ हुआ जिससे पारिवारिक परम्परा भी कमजोर हुई। यही कला कालान्तर में समकालीन कला के रूप में प्रतिस्थापित हुई और उसके कलाकारों ने समकालीन विचारों को लेकर विविध तकनीकियों का उपयोग कर एक नयी धारा की शुरूआत हुई है।

                    कालान्तर में इनके चलते अनेक तरह बदलाव के साथ नवीन परिवर्तनों ने विभिन्न प्रकार के माध्यमों को भी आजमाया और इनके विभिन्न शिक्षण केन्द्रों में भी इस नए बदलाव की शुरूआत हुई। जो विभिन्न स्कूलों के रूप में सामने आए विशेषकर ब्रिटिश शासन काल में जिन पश्चिमोन्मुखी कला शिक्षण की शिक्षा को प्रारम्भ किया गया उनमें पारंगतता के उपरान्त भी केवल कला की पराधीनता की जिस विधा को भारतीय कला के स्थानापन्न करने के लिए जिन अनेक स्कूलों की स्थापना हुई थी वहीं धीरे धीरे नवीन अवधारणा ने जगह बनाई। उनकी उपस्थिति आज हमारे सम्मुख जिस रूप में है वह कितनी सुखद है उसका मूल्यांकन अलग तरह से किया जाना चाहिए। पर इनकी प्रासांगिकता तत्कालीन दौर में जो भी रही हो पर आज उनका स्वरूप काफी बदल गया है। जबकि संगीत और नृत्य के अनेक घराने आज भी अपनी महत्ता कायम किए हुए हैं। 

                    क्योंकि कला शास्त्रों से बहुुत पहले की चीज है अतः कलाओं की मूल्य दृष्टि एवं मानवीय उपयोगिता का सवाल हमेशा सृजन की संभावनाओं को स्थान प्रदान करता है, यही कारण है कि रचनाओं की विविधता का शास्त्रीय स्वरूप तय किए जाने के बाद भी वह उन नियमों को तोड़ती रही हैं। ‘‘रचनात्मकता का संबन्ध साक्षर या शिक्षित होने से जरा भी नहीं। सांस्कृतिक दृष्टि से नितांन्त असंस्कृत महाकवि र्भृहरि के पात्र,’’ बहुत से शिक्षितों के हाल सब जानते हैं।’’ 

                    कलाओं की मूल्य दृष्टि-हेमन्त शेष की पुस्तक उद्धृत यह अंश कला शिक्षा के स्वरूप को परिलक्षित करता है अब सवाल यह है कि कला आन्दोलनों की स्थिति को कला शिक्षा से कैसे जोड़ा जाय, यही भारतीय कला आन्दोलन की प्रासांगिकता को चिन्हित कराने में सहायक होगा जबकि समकालीन कलाकारों की सूची में जिन नामों को शरीक किया गया है उनपर सवाल उठेगे कि उनके मानदण्ड क्या हैं ? उनको समझने के लिए कला के विकास की अवधारणाओं को समझना होगा जिनकी वजह से कला में बदलाव उत्पन्न हुए। 

                   अब तक कि कला प्रक्रिया में 1947 के प्रोग्रेसिव ग्रुप में-के0 एच0 आरा, एस0 के0 भाकरे, एम0 एफ0 हुसेन, एच0 ए0 गैडे, एस0 एच0 रजा, एस0 एन0 सूजा जिन छह कलाकारों को प्रोग्रेसिव ग्रुप में सुमार किया जाता है वह जिन विशेषताओं की वजह से जाने जाते हैं। परन्तु प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप का 1956 में विभाजन और स्वाभाविक रूप से दूर हुए फीका, समूह के कलाकारों को अपनी व्यक्तिगत शैली बनाने में व्यस्त थे. पीएजी के साथ जुड़े कलाकारों की सूची में लगभग सभी महत्वपूर्ण कलाकार लगभग 1950 में बंबई में काम कर रहे कलाकारों को भी शामिल किया जा सकता है। छह संस्थापक सदस्यों के अलावा, जुड़े कलाकारों मंे निम्न कलाकारों के नाम भी समिमलित हैं-वी.एस. गायतोंडे, कृष्ण खन्ना, अकबर पदमसी, तैयब मेहता, राम कुमार, बाल छाबड़ा के बीच भरोसा कर सकते हैं। यह प्रगतिशील समूह है, जो नए प्रतिभा को कोकून के बाहर उभरने में मदद किया था। कुछ तत्कालीन दौर के भारतीय कलाकारों की पीढ़ी जो पहले के कलाकारों ने जो उनके लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए उनकी अभिव्यक्ति के विविध प्रतिभाओं के मालिक है और भारतीय समकालीन कला के उन्नायक भी।   
     
                 आज कई ज्ञात अज्ञात भारतीय कलाकारों की व्यक्तिगत शैली है जिसे वे सक्षम करने में एवं आगे ले जाने में लगे हैं, और यह समाज में स्वीकृति प्राप्त करने के लिए निरन्तर यत्न कर रहे हैं। समकालीन कला आन्दोलन को आगे ले जाने में जिन कलाकारों ने अपना योगदान बेनामी या गुमनामी में किया है वह भी इस आन्दोलन के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 

                वर्तमान दौर का कलाकार उनसे दूर तो हुआ है परन्तु कलामूल्यों को लेकर नहीं, जबकि नयी पीढ़ी के दौर में रचना प्रक्रिया के तौर तरीकांे ने कई नये आयाम कला को दिए हैं जिनमें स्थान विशेष का जिक्र किया जाना उतना महत्व का नहीं है जितना उनकी प्रक्रियाओं का यह कार्य कमोवेश देश के हर हिस्से में हुआ है। जिनकी वजह से भारतीय कला ने अपनी उपस्थिति कायम की है। 

              वहीं दूसरी ओर जहां बड़े संस्थानों के कलाकार अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे और जिनसे ऐसा नहीं हुआ दोनो के अलग ग्रुपों ने कला जगत में अपनी छाप छोड़ी है उसका मूल्यांकन कब होगा इसकी घोषणा करना संभव नहीं है जब समकालीन व्यवस्था इन कलाओं के भविष्य से आंख मूंद लेती है तब कलाओं के पतन का दौर आरम्भ हो जाता है। 

              आगे समकालीन कला और कला शिक्षा पर नजर डालने पर कई तत्व सामने आते हैं जिनका उल्लेख यहां करना वाजिब होगा। आजादी के पूर्व और उसके उपरान्त जिस तरह से विविध क्षेत्रों में बदलाव शुरू हुए उनमें कला का स्थान भी महत्व का रहा है राष्ट्र्ीय कला अकादमी की स्थापना, विभिन्न विश्वविद्यालयों में कला शिक्षण की सुविधा तथा अनेक कला महाविद्यालयों की स्थापना। 

              इस बीच की कला उपलब्धियां और उनका मूल्यांकन किया जाय तो अनेक महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आते हैं। उन मनिषियों ने जिन्होंने भारतीय कला तत्वों एवं तकनीकी ज्ञान की स्थाई स्थापना के अध्ययन की नींव डाली होगी। परन्तु आज ये संस्थान उस समय की आकल्पित उक्त अवधारणा के उन स्वरूपों में जिस उत्थान की परि कल्पना की गयी थी उसका स्वरूप क्या हो गया है वह विचारणीय है।  उनकी अवधारणओं का जो प्रस्फुटन हुआ वह उन विकासशील स्वरूपों में न होकर जिन स्वरूपों में हुआ है वह किसी भी तरह भारतीय कला का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यहां विशेषकर बंगाल, बड़ौदा और मुंम्बई को लिया जा सकता है। परन्तु थोक में जिन कला प्रक्रिया को अनेक महाविद्यालयों में अपनाया जा रहा है, जिनकी दशा दिशा को समझने के लिए अनेक कला शिक्षण संस्थानों का नाम लिया जा सकता है। 

              इनके अतिरिक्त आधुनिक कला के बहाने समकालीन दौर की कला प्रक्रियाओं से विमुख अनेक शिक्षण संस्थानों की स्थिति तो और भी सोचनीय है। जिस तरह इनके शिक्षण साम्राज्य स्थापित हुए उनके कर्णधारों ने कला को नहीं किसी और विन्दु को महत्वपूर्ण करके जिस अ-कला को ही बढ़ाया गया  है। यह भयावह दौर कला की इस वर्तमान स्थिति को इस स्थिति तक लाने में निश्चित तौर पर एक जटिल प्रक्रिया के अधीन आकर या होकर जहां तक पहुंचा है उसके अनेक उदाहरण हमें मिलते हैं। जिसके प्रभावी या अ-प्रभावी प्रभाव का मूल्यांकन कब होगा, कहना कठिन है। इसके और भी कारण हैं जिनमें विभिन्न प्राथमिक विद्यालयों की जटिल कला शिक्षा व्यवस्था या यूं कहें कि व्यवसायिक अवस्था के कारण मौलिक पद्धतियों की वजाय निहायत व्यवसायिक आधार ने जो कमजोर आधार खड़ा किए हैं वह शैक्षिक प्रक्रिया को प्रभावित करने में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यदि हम इसका अध्ययन निम्न विन्दुओं के आधर पर करें तो जो परिणाम सामने आएंगे उन्ही से सच्चाई का आकलन किया जा सकता है। यथा-  विद्यार्थी,शिक्षक,पाठ्यक्रम,क्लास,स्ंासाधन,परीक्षा प्रणाली एवं व्यवस्थागत मानसिकता का मूल्यांकन किया जाना आज की समकालीन कला के स्वरूप को स्पष्ट करता है। 

             जिनका मतलब सीधे सीधे कलाओं को दयनीय बनाकर अपनी चेरी बनाना मात्र रह गया है। यही कारण है कि इस तरह के संस्थान कलाओं की वजाय कलाओं की अनुकृति कराने के केन्द्र मात्र बनकर रह गए हैं। यही नहीं अब तो इनकी यही व्यवस्था गुरूशिष्य की परम्परा बन गयी है। इनके उदाहरण हमें अनेक कला शिक्षकों के रोने धोने में दिखाई ही दे जाता है यथा आजकल के बच्चों के पास वक्त ही नहीं है क्लास में ही नहीं आते हैं, गांव के बच्चे न जिनके पास सामग्री होती है और न ही उन्हें समझ, उनके गार्जियन भी ऐसे हैं, इसलिए पाठ्यक्रम ऐसा रखिए जिससे काम आसानी से निकल जाए। और आश्चर्य जनक यथार्थ से रूबरू होना पड़ा है इस कला शिक्षा के जिम्मेदार शिक्षक होने का अरमान रखने के कारण। यहां उस यथार्थ की वानगी - स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के कल शिक्षण की आवश्यक सुविधाओं पर नजर डालें तो उनका कोई मानदण्ड लिखित रूप में कहीं उपलब्ध नहीं है, पर प्रयोगात्मक कक्षाओं की सामान्य व्यवस्था अनेक उन्नत कला महाविद्यालयों तक में उपलब्ध नहीं है जो अपने आप में एक बड़ी विडम्बना है। 
          
              यदि इनके विस्तार की बात की जाए तो उत्तरोत्तर उन प्रवृत्तियों को ही बढ़ावा मिल रहा है जिसमें कला मूल्यों एवं उनकी मौलिकताओं का अभाव है। इनके स्पष्ट कारण जो दिखाई दे रहे हैं उनमें कला की शिक्षण संस्थाएं, उपयुक्त संसाधन और निपुड़ ज्ञानदाताओं की अनुपलब्धता भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इनसे भी महत्वपूर्ण यह है कि कलाकार बनने के लिए शिक्षा ग्रहण कर रहे शिक्षार्थी जो हैं वह या तो डिग्री के लिए अच्छे अंक पाने के लिए किसी न किसी प्रकार अपने कोर्स पूरे करते हैं। जबकि वे सब कलाकार के पाकर नौकरी के लिए। इसके विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि जितने कलाकार इन क्षेत्रों में दिखाई देने चाहिए थे वास्तविकता उनसे परे हैं। जो इस प्रकार के कलाकार हैं वह सतह पर कितने नजर आते हैं उन परिक्षेत्रों में जहां पर कला के ऐसे संस्थान हैं। अनेक कला महाविद्यालयों में इन स्थितियों से भिन्नता दिखाई तो देती है। 
              यही कारण है कि जिस स्थान पर कला को होना चाहिए था आज वहां नहीं है। इन्ही कारणों से आज की कला शिक्षा में जिन मूल्यों की प्रतिस्थापना होनी चाहिए थी कहीं न कहीं उनका संकट उपस्थित है। पर नित नए संस्थान जन्म ले रहे हैं जहां केवल और केवल यह हो रहा है कि शिक्षण प्रशिक्षण की कला का विकास तो हो रहा होगा पर कला के शिक्षण प्रशिक्षण की कला मूल्यों एवं उनकी मौलिकताओं का अभाव है यही कारण है कि सारी प्रक्रियाएं ठहरी हुयी सी प्रतीत हो रही हैं। हो सकता है कल कोई कला जिज्ञासु आए और इनको झकझोरने की कोशिस करे। फिर इनकी नींद टूटे और कला सृजन की संभावनाओं की भी इन्हे भी चिन्ता हो जो केवल और केवल नौकरियों वाली कला शिक्षा, उपाधियां उपलब्धियों की जगह ले ली हैं ।



लेखक का परिचय 
अध्यक्ष 
असोसिएट प्रोफ़ेसर 
चित्रकला विभाग , एम्.एम्.एच.कालेज  गाजियाबाद
(चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से सम्बद्ध)


 



सोमवार, 24 जनवरी 2011

गीत

कैप्शन जोड़ें






















































































गहरे अर्थ भरो 
रंगों से या रेखाओं से
या परिवेशीय तत्वों से 
पर गहरे भाव रचो .

भेदभाव से
अनुकरण करो 
पर कैसा हो अनुकरण तुम्हारा  
इस पर गौर करो 
तुम हो या तुम नहीं हो  . 









शनिवार, 11 दिसंबर 2010

कला में पैठ और कलात्मक बलात्कार

डॉ.लाल रत्नाकर

अब आमजन और खास जन की कला का भेद बहुत साफ तौर पर नज़र आने लगा है, आमजन की कला में व्यवसयिकता ने कला नियमों व मान्यताओ की सारी सीमाओं का उल्लंघन कर दिया है यदि कुछ भी साफ सुथरा कहीं हो सकता है तो वह है बाज़ार से सुदूर गाँव के वे लोग जिन्हें आज की व्यवसयिकता ने अभी अपने आगोश में नहीं लिया है.क्योंकि बाजार का विकृत रूप वहां नहीं पहुंचा है। जब जब कला पर विचार की बात आती है तो हमारे सामने  और कला समाज के सामने वही गिने चुने नामचीन लोग जिन्हें न जीवन की और न ही रचना की तकनीक का कोई ज्ञान है परंतु उन्हें उनकी जानकारी ही बड़ी लगती है.  तकनीक तो तब भी थी जब कला सामग्री के लिए कलाकार प्रकृति के अवदानों पर आश्रित था। पर तब और अब में फर्क इतना ही हुआ है की तब रचना के मायने देशज प्रक्रिया के थे पर अब तो वैश्विक सरोकार खड़े है, कला पहचानी ही जाती है अपनी देशज मान्यताओं, प्रतीकों, तकनीकियो (विधियों) से 'न' की नकली मृग्मरिचिकाओं से।आज का बौद्धिक समाज जितने गूढ़ संसर्गों के साथ कला पर काबिज होने का दंभ भर रहा है वह मूलतः कलात्मक प्रवृतियो पर ही नहीं पुरे उस समाज पर हमला है जिसे वह विस्थापित करना चाहता है, जबकि पहले ऐसा नहीं था। साथ ही साथ एक बड़ी साजिश के साथ भी इसमे बाज़ार कम सामाजिक व्यभिचार ज्यादा ही है. यद्यपि व्यभिचार अटपटा लग सकता है पर यदि इस पर विचार किया जाय तो स्पष्ट रूप से यह स्थितियां नज़र आएँगी यहाँ हमारी यही कोशिश है कि साफ और स्पष्ट तौर पर इस अवधारणा पर बात की जाये ;-

आजादी के बाद विविध क्षेत्रों में विकास की जो अवधारणाएं बनाई गयीं और उसमें जो फौज आई वे कौन थे। इन तमाम कला आन्दोलनों के लिए या उनके विकास के लिए, जिनमे अनेकों संस्थाए खड़ी की गयी उनके उद्येश्य अवश्य पवित्र रहे होंगे, जिनके मन में ये विचार आये होंगे की हमें साहित्य संगीत और ललित कलाओं के उत्थान पर काम करना है. पर हुआ क्या और आज क्या हो रहा है. यही कारण था की इनके विकास के लिए अकादमियां स्थापित की गयी थी, जिसमे यहाँ हम विशेष सन्दर्भ ले रहे है ललित कला अकादमी नई दिल्ली का. आंकणों का लेखा जोखा निकाला जाय तो यह बात प्रकाश में आती है कि कला को बढ़ाने की बजाय अपनो अपनों को बढ़ाने की प्रवृति ने पूरे कला जगत में एक वह वर्ग खड़ा कर दिया जो केवल और केवल किसी न किसी दबाव या प्रभावशाली लोगों के समीकरण पर कड़ी हुयी, यद्यपि यह दृष्टि मेरी ही नहीं कई बड़े और कुशल कलाकारों की भी है जिनका मानना है की वहां कला और कलाकार की पूंछ नहीं होती ग्रुप की होती है, यथा बदौड़ा तो बड़ोदा कोलकाता तो कोलकाता पंजाबी तो पंजाबी पर इनके बीच जो सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व होता है वह है 'ब्राह्मण' कलाकार है या नहीं यदि ब्रह्मण है तो चलेगा, जिसका अब इतना असर हो गया है की यदि आप इसके खिलाफ आवाज़ उठाते है तो आप को कला विरोधी और अ कलाकार घोषित कर दिया जायेगा. विरोध के स्वर कई बार उठे पर सारी सामाजिक इकाइयों की तरह इस विरोध का नेतृत्व भी अंततः ब्राहमण ले लेता है और धीरे धीरे सारी लड़ाई/ विरोध ही बंद हो जाता है.

यहाँ यह सवाल उठाना बेमानी ही होगा की देशज कलाकारों की क्या गति हुई फिर जवाब की लड़ी राष्ट्रीय कला संग्रहालय आधुनिक कला संग्रहालय इतना ही नहीं क्राफ्ट म्यूजियम आदि आदि. कुल मिलकर इतना घाल-मेल की पूरी अवाम इसी में गोते खाती रही और कला की कलाकारी उनसे चलती रहे आज इस पूरे प्रोसेस में वास्तविक कलाकार की जगह कहाँ है खोजनी पड़ेगी पर इसकी खोज के लिए भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय निरंतर काम कर रहा है पर आज तक उसकी तलास कहाँ पहुंची है यह एक अलग शोध का सवाल है .

दूसरी ओर विविध प्रकार के कला संस्थान और उनके प्राध्यापक जिन पर बड़ी जिम्मेदारी थी कला के विकास की पर इन्होने राष्ट्रीय धारा का सहारा लिया और बड़ी सिद्दत से कला उत्थान में जम गए "मुझे याद है एक बार मेरे एक मित्र ने कला पर एक आलेख खासकर जिस विश्वविद्यालय में हम लोग है पर लिखने का आग्रह किये मै बड़े उत्साह में बगैर भेदभाव के लिख दिया 'वहां के कला विषय की कुशलता पाठ्यक्रम की सारगर्भिता गौरवपूर्ण पारदर्शिता ५५ वर्षों का कला उत्थान गलती से या व्यस्तातावश बगैर उनकी सम्पादकीय कुतर छांट के छप गया .छपने की प्रक्रिया में कई त्रुटियाँ अलग तरह की थी जो अशोभनीय थीं पर काफी दिनों बाद मेरे मित्र की शिकायत थी वह कोई लेख था वह, वह तो पत्रकार जैसी रिपोर्टिंग थी जबकि वहीँ पर उनके आलेखों में प्रशंसा के आलावा सच का कहीं नामों निशान नहीं कमोवेश यही हाल कलाओं के शोध लेखन एवं उनकी तकनीकियों के मामले में दिखाई देता है.

कई एसे साहित्य कला पर पुस्तकाकार रूप में आये है जिनमे इतनी गलत जानकारियां है, इतने अशोभनीय और सिद्धान्तहीन रेखांकन है जिनका सरासर अनुकरण पूरे परिक्षेत्र में चल रहा है, एक विदुषी तो येसी भी है जिनको कला न तो विरासत में मिली और न ही कला का कोई अध्ययन जिसका कोई लेना देना नहीं है पर देश का हर आदमी उस कला को लेकर बहस पर बहस किये जा रहा है, जहाँ कला नदारद है और साहित्य ने सारा ठेका लेकर गुणगान किये जा रहा है की नग्नता नहीं है, कला में कुछ भी नंगा नहीं होता, निर्वस्त्रता तो कला को उन्नत करती है, यह भी अजीबो गरीब कहानी है जहाँ न अनुपात है और न ही शारीर सौष्ठव पूरा का पूरा साम्राज्य नक़ल की पराकाष्ठा को पार कर रहा है जहाँ शुद्ध रूप से जातीय अहंकार और उसकी प्रशंशा की गयी है क्योंकि जितने वाह वाह हुए है उसमे कहीं कला की समझ नज़र नहीं आती है .

दुनिया भर में कला संग्रहालय है उनमे जिनकी कलाएं है उनकी चर्चा होती है आजकल वही चलन हिंदुस्तान में भी हो गया है पर उनकी कलाओ का कोई लेखा जोखा उनकी गुणवत्ता से नहीं है जिनके कारन वह संगृहीत की जानी चाहिए वह नहीं है जो संग्रहित है उनका स्थान हमारी योग्यताओं तथा तिकड़म की बौद्धिकताओ पर आधारित है (एसा भी नहीं की जो वाजिब कृतियाँ है उनका संग्रहण नहीं है पर जब कला दर्शक तमाम रचनाओं से आगे बढ़ जाता है), यथा कलादीर्घा में कला की जगह एक वर्ग ने बना ली है जिसका खामियाजा यह हो रहा है की पूरे संग्रहालय उन्ही को तब्बज्जो दे रहे है जो उनके इर्द-गिर्द घूम रहे हैं, एसी स्थिति में कलाएं कम और तिकड़म ज्यादा प्रभावी हो रहे है. यदि इनकी यही गति रही तो ये संग्रहालय जनता के लिए न होकर खासजनो के आय के श्रोत के लिए ही रह जायेंगे. 


(क्रमशः)

गुरुवार, 20 मई 2010

लोककला

लोककला व संस्कृति के संवाहक पत्थर के कोल्हू
डाॅ.लाल रत्नाकर
यद्यपि लोक की कलाओं के इतिहास में जाएं तो हम सदियों सदियों के अन्तराल को भी कमतर पायेंगे मानव के उद्भव से ही ये कलाएं भी सहज ही उत्पन्न हो गयी होंगी, क्योंकि आदिम कला का इतिहास आज भी जिस रूप में हमारे सम्मुख है उसका स्वरूप किसी भी तरह बदला नहीं है और यही कारण है कि लोक कलाएं भी अपने स्वरूप को बदल नहीं पाती हैं जैसे ही इनका स्वरूप बदलता है वैसे ही इनकी पहचान समाप्त होने लगती है। समय की विडम्बना है कि जो कल महत्वपूर्ण था वह आज उतना महत्व नहीं रखता, पर लोक का विश्वास इससे परे परम्पराओं को लेकर चलने का है उन्हीं को सजाने संवारने और निरन्तरता को बनाए रखने में ही अपना उत्थान मानता रहा है। यही कारण है कि ये कलाएं पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं और लोक को अपने में पिरोए दूर तक ले जाती हैं, यही कारण है कि इन्हें परम्परागत कह कह कर उपेक्षित किया जाता रहा है।
पर इन्हीं कलाओं में मधुबनी, वार्ली, पटचित्रण, कलमकारी, गोंड, रंगोली, फड़, बाटिक, अल्पना, जादोपटिया, पिछवई, पिथोरा आदि कलाएं तो हैं ही साथ ही लोकगीतों की विस्तृत परम्परा भी है। 
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत की लोक कलाएं अपने विविध रूपों में फैली हुई हैं, जिनमें मेंहदी, महावर, गोदना और मुखौटों का प्रमुख स्थान है। इन्हीं कलाओं के रूप में लोक लिबास, पहनावे, आभूषणों की भी विविध परिपाटी देश के विभिन्न कोनों में नजर आ ही जाती है। इनके अलावा लोकरंग के सुन्दर रूप लोक वास्तु में भी दिखाई देते हैं, यथा मड़ई की विस्तृत रूप भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग तरह के नजर आते हैं, यहीं पर कच्चे मकान और उनमें प्रयुक्त होने वाले नाना प्रकार के अवयव लोक की विरासत के रूप मे अपना स्थान बनाते हैं। जबकि पूरे देश में फैले ‘काष्ठ’ के कलात्मक कार्य उसी लोक काष्ठ कलाकारों की देन हैं जो अपनी स्थानीयता को संजोए कईबार उन्नत कला के ग्रास बन जाते हैं। इसी क्रम में हमें घरेलू सामग्रियों को नहीं छोड़ना चाहिए जिनमें लोक कलाएं प्रमुखता से अपनी जगह बनाती हैं चूल्हे चैके से लेकर कठौता, मथानी, मचिया, खटिया, नक्कासीदार आलमारियाॅं पलंग, खम्भे, घोडि़या, दरवाजे और पूजा से जुड़े सामानों में रेहल, चैकी व मन्दिर भी लोक में प्रायः नजर आते हैं। इनका निर्माण स्थानीय लोककला का रचनाकार लोक का परम्परागत स्वरूप ही उनकी रचनाओं में दिखता है।
उक्त विस्तार को विराम देते हुए हम इसी तरह की कलाओं में पत्थर व लकड़ी के वो काम जो बहुत ही महत्व के हैं,  जिनमें लोक कलाओं के मोटिफ एवं प्रतीक भरे पड़े हैं, जो पूरे देश में किसी न किसी रूप में प्राप्त होते हैं जिनमें लोककला की परम्परा ही दिखती है। जिनका स्वतंत्र रूप से विवेचन किया जाना है, समय और विषय को प्रभावशाली बनाने हेतु यहाॅं पर पत्थर के कोल्हू के उत्कीर्णन का काम दर्शनीय है। 
लकड़ी का दरवाज़ा इस पर भी वही प्रतीक हैं जो पत्थरों में 
उत्तर प्रदेश के पूरे पूर्वंाचल वाराणसी, मिर्जापुर, जौनपुर, आजमगढ़, गोरखपुर, फैजाबाद, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ आदि में फैले या बिखरे पत्थर के कोल्हू जहां किसी जमाने के सम्पन्नता और कृषि की उन्नतता के प्रतिबिम्ब के प्रतीक थे वहीं वह विलक्षण कला धरोहर के साथ साथ सांस्कृतिक, धार्मिक सामाजिक एवं श्रृंगारिक सभ्यता के सम्वाहक के रूप में गुजरे हुए कल के गवाह के रूप में विरान पड़े हैं, इन पर अंकित प्रतीक व रूप हमारे कौशल का जो इतिहास बयां कर रहे हैं वह दुनिया के लोककला के पटल पर यदि अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें तो अद्वितीय धरोहर होंगे दुर्भाग्यवश ये अमूल्य निधि सरकारी लापरवाही और संरक्षण की उपेक्षा व अभाव के कारण कहीं नष्ट न हो जाएं। अविभाजित उत्तर प्रदेश के उस जमाने के कला एवं सांस्कृतिक कार्य निदेषक से लेखक अपने शोध निर्देशक प्रो0 आनन्द कृष्ण के साथ मिलकर यह आग्रह किया था कि इन लोककलाओं की अमूल्य धरोहर की रक्षा के लिए कुछ करिऐ पर बात आई गयी हो गयी, तब से अब तक तो लम्बा समय गुजर गया है।
पत्थर का कोल्हू पूर्ण रूप में 
पत्थर का कोल्हू पूर्ण रूप में 
अब हम आते हैं इन्ही कोल्हुओं के बारे में विस्तार से बात करने के लिए क्योंकि इनका सम्बन्ध लोक के बहुउद्ेशीय कला स्वरूपों से जुड़ा हुआ है, जहाॅ एक ओर ये उपयोगी यन्त्र के रूप में प्रयुक्त होते हैं वहीं इनका धार्मिक, सामाजिक, श्रृंगारिक, शैक्षिक व प्रतीकात्मक अवयवों को समेटे हुये हैं वहीं तांत्रिक और आध्यात्मिक मूल्यों का भी समावेश भी है इनमें।

पत्थर का कोल्हू पूर्ण रूप में 
पत्थर का कोल्हू पूर्ण रूप में 
इन कोल्हुओं का निर्माण कालान्तर से कृषि उपयोग में किया जाता रहा है अतः लोक में प्रचलित हर प्रकार की वस्तुएं अलंकृत किए जाने की परंम्परा प्राचीन काल से ही हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। मिट्टी की भीत हो या गोबर के भिठहुर हो लकड़ी की सामग्री, कपड़ों पर अलंकरण, कढ़ाई बुनाई यथा पंखे थैले, जूट और सरपत के अलंकृत पात्र यथा कुरूई, मौनी, भौकी, पेटारी, पेटारा या कोहबर, चैक, अल्पना या विभिन्न त्योहारों एवं मंागलिक अवसरों बनाये जाने वाले नाना प्रकार ‘लोक कला’ के रूप जो परम्परा से चले आ रहे थे जो आज औद्योगिक हमलों और बाजारवाद के भेंट चढ़ गए। उक्त प्रकार के पत्थर के कोल्हू यद्यपि गन्ने की पेराई के उपयोग में लाये जाते थे, जिनका निर्माण काल क्या है ठीक ठीक ज्ञात नहीं हो पाता परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही कोल्हू के इस रूप का चलन हमारे षास्त्रों में उल्लिखित है। जबकि इसी प्रकार के कोल्हू का प्रयोग तिलहन पदार्थाें से तेल निकालने के हेतू भी किया जाता है यद्यपि यह कोल्हू काष्ठ निर्मित होते हैं।
हाथी के विविध रूपों मंे एकरूपता के नाम पर उसकी संरचनागत विशिष्टता के साथ साथ रचनाकार की मौलिकता का प्रदर्षन सभी चित्रों में बना रहता है।
पत्थर का कोल्हू पूर्ण रूप में 
पत्थर का कोल्हू टुटा हुआ 
 इन आकृतियों में हाथी का अलंकरण जिसको स्थानीय लोगों द्वारा श्रृंगार व झोल डालकर तैयार किया जाता है जिसे भिन्न नामों से पुकारा जाता है इनके अलावा इनके हौदों को भी बखूबी बनाया गया है हौदों के आकार भी भिन्न-भिन्न हैं झोल व श्रृंगार भी विविध रूपों में बनाए गये है, हथसवारों के अतिरिक्त इनके पिलवान हाथी के सिर और पीठ के बीच लगभग गले के उपर बैठाये दिखाए गए हैं जहां हथसवार के हाथ में हुक्का या पंख्ेा के आकार की आकृतियां अंकित हैं वहीं सईस के हाथ में भालानुमा अस्त्र भी दिखाया गया है, हथसवार को मेहराब की आकृति में अंकित किया गया है। इन आकृतियों को उकेरने हेतु जिन औजारों का प्रयोग कलाकार करते थे उन्हें वे स्वंय तैयार करते थे ज्यादातर ये लाल बलुए पत्थरों मंे बनाए गए हैं। 
अगरौरा जौनपुर के कोल्हू में हथसवार के ठीक पहले गणेश जी की आकृति एक मेहराब में दिखाई गयी है ये चार हाथ वाले गणेश जी है जिनके हर हाथ में कुछ न कुछ दिखाया गया है। एक हाथ में वाद्य यंत्र दूसरे में मोदक तीसरे और चैथे में माला या पंखा के आकार की आकृतियां निरूपित की गयी हैं। सिर पर पहाड़ के आकार मुकुट बनाया गया है गले में माला की आकृति बनाई गयी है और जिस आसन पर वह बैठे हैं उसे इस तरह का बनाया गया है जो हाथी के समान दिखाई दे रहा है।
नाना प्रकार की आकृतियों से अलंकृत ये कोल्हू अपने में एक लोक का सांस्कृतिक इतिहास समेटे हुए है, परन्तु रख-रखाव की अव्यवस्था के चलते इनके नष्ट होने के हालात निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं। इस तरह की अव्यवस्था के अनेक कारण हैं जिसमें आबादी की बेतहासा बृद्वि भी है जिसके कारण इसे या तो नींव में छुपा दिया जा रहा है या तोड़कर इसके टुकड़े बना दिये जा रहे हैं। वैसे तो नाना प्रकार ‘लोक कला’ के रूप जो परम्परा से चले आ रहे थे उनके संरक्षण एवं संकलन की महती आवश्यकता प्रतीत होती है, परन्तु उक्त प्रकार के कोल्हुओं का संरक्षण एक मुश्किल काम भी है क्योंकि इनकी लम्बाई मोटाई और भार इतना अध्कि है कि बिना अभियांत्रिक मदद के सम्भव नहीं हो सकेगा । 
अतः यदि हमें इस अमूल्य धरोहर को बचाना है तो इसके लिए समुचित माध्यमों से इस लोक कला के संरक्षण की गुहार लगानी पड़ेगी यदि समय रहते इनकी संरक्षा न हुयी तो यह लोक और लोककला की अमूल्य थाती लुप्तप्राय हो जायेगी। 

डाॅ.लाल रत्नाकर
रीडर व अध्यक्ष, चित्रकला विभाग, 
एम0 एम0 एच0 कालेज, गाजियाबाद-201001

M.F. Husain






M.F. Husain

Born at Pandharpur, Maharashtra, India on September 17, 1915, he had become a photogenic icon, and the newspapers loved him. The stuffy Calcutta Club was pilloried when it refused admission to a barefoot Husain on the grounds that he violated their dress code.

He was nominated to the upper house of the Indian Parliament, the Rajya Sabha in 1987; and during his 6 year term he produced the Sansad Portfolio.

In 1966 Husain was awarded the Padmashree by the Government of India. In the following year he made his first film, Through the Eyes of a Painter. It was shown at the Berlin Festival and won a Golden Bear.

India's most controversial and most loved M. F. Husain is one of the few artists who enjoy multifarious range of occupations interests and passions. His love for Indian music, movies, jewelry, tapestries, photography and literature is well known. Besides being one of the most popular Indian painter, he has made international award winning films and created beautiful designs in tapestry, jewelry and toys. His autobiography "Pendhapur ka ek Ladka" is a master piece written in Hindi.

सम्मान परस्पर होता है न...

परिवर्तन प्रकृति है। परिवर्तन ही हमें भौतिक और आत्मिक दोनों स्तरों से जीवन को समझने का अवसर देता है। प्रकृति की इस शिक्षा के बगैर हम उस दहलीज तक नहीं पहुंच सकते थे, जहां से हम चाहें तो उस पार उतर सकते हैं। उस पार जहां से चेतना का एक और विकसित स्तर शुरू होता है। यह बात किसी धार्मिक या आध्यात्मिक उपदेश का अंश नहीं... यह प्रकृति का संदेश है, महसूस करें। परिवर्तन ही हमें यह भी संदेश देता है कि सुधरने, सुधारने और उस अनुरूप आचरण नहीं करने का हठ प्रकृति को खुद बदलाव के लिए विवश करता है और तब मनुष्य, या समाज, देश या धर्म किसी को भी उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। हमें व्यक्तिगत नजरिए से भी और समग्रता से भी इस दृष्टिकोण से जीवन को देखना चाहिए। आप अपने आसपास हुई दो घटनाओं पर ध्यान दें। पाकिस्तान के पेशावर इलाके में सिख युवक का सिर कलम किए जाने की घटना और मकबूल फिदा हुसैन की देश में सम्मानजनक वापसी के लिए उठ रही तमाम ‘मानवीय’ मांगें। सिख युवकों को पाकिस्तानी तालिबानों ने अगवा कर यह दबाव डाला कि वे सिख धर्म त्याग कर इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें। इस आपराधिक दबाव के आगे झुकने से सिखों ने इनकार कर दिया और बदले में तालिबानों ने उनमें से एक का सिर काट कर उसे गुरुद्वारे में पहुंचा दिया। यह पाकिस्तान में लगातार हो रहा है और वहां रहने वाले हिंदुओं, सिखों या अन्य अल्पसंख्यकों को भीषण त्रासदी से गुजरना पड़ रहा है। तालिबानों के हाथों शहीद हुए सिख युवक जसपाल सिंह ने मां से वादा किया था कि वह उन्हें स्वर्ण मंदिर के दर्शन कराने जरूर ले जाएगा और इस यात्रा के लिए उसने वीज़ा वगैरह लेने की औपचारिकताएं पूरी भी कर रखी थीं। लेकिन धार्मिक-अहमकता में भावुकता को कोई जगह नहीं मिल पाती और जसपाल जैसों की जान चली जाती है।

दूसरी तरफ हैं हिंदू देवियों का असम्मान रचने वाले स्वघोषित ‘देशनिकाले’ पर विदेश भागे कलाकार मकबूल फिदा हुसैन। बारूदखाने में चिंगारी लगा कर यह ‘भारतीय’ कलाकार कतर की गलियों में गायब हो गया। ऐसे व्यक्ति की सम्मानजनक वापसी के लिए आडंबरियों की तरफ से मांगें उठ रही हैं, यह भारत की अजीबोगरीब विडंबना है। नैतिकता का एक ही तकाजा होना चाहिए। डेनमार्क की एक पत्रिका में एक कार्टून छप जाता है तो दुनियाभर के मुसलमान इसे पैगम्बर मोहम्मद की तौहीन समझ कर विरोध प्रदर्शनों का तांता लगा देते हैं और मौलानाओं की तरफ से पत्रिका के कार्टूनिस्ट कर्ट वेस्टरगार्ड का सिर कलम करने के फतवों की झड़ी लगा देते हैं। ऐसे ही फतवे हिंदू देवियों को असम्मानित करने वाली रेखांकृतियां बनाने वाले काफिर मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ क्यों नहीं जारी हुए? धार्मिक भावनाओं के असम्मान से नाराज होने वाले इस्लाम के धर्मगुरु हिंदू देवी-देवताओं के असम्मान से नाराज क्यों नहीं होते और फतवा क्यों नहीं जारी करते? डेनमार्क की पत्रिका में छपे कार्टून पर भारत में उग्रता फैलाने में लगे रहे मौलानाओं का मकबूल फिदा हुसैन के नापाक कृत्यों की ओर कभी ध्यान नहीं गया। हुसैन पर यह शातिराना चुप्पी क्यों? धर्मगुरु चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, उन्हें इस नैतिकता का एहसास तो होना ही चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म का असम्मान करने का हक नहीं। जिस भी व्यक्ति, समाज या धर्म ने दोयम चरित्र अपनाया, आप समझ लें उसका सम्मान जल्दी ही धराशाई होने वाला है भौतिक रूप से भी और आत्मिक या आध्यात्मिक रूप से भी। किसी की भी धार्मिक भावना का अपमान निंदनीय है... तब और ज्यादा जब एक मसले पर समवेत सियाल-स्वर जाग्रत हों और दूसरे के मसले पर कुटिल मुस्कुराहटों भरी चुप्पी। कोई भी धर्म हमें किसी को आहत करने की इजाजत नहीं देता। और अगर देता है तो यह हमारा ही पुनीत कर्तव्य है कि हम उसमें समय रहते संशोधन कर लें... अन्यथा प्रकृति परिवर्तन का अपना रास्ता अख्तियार कर ही लेगी। यह स्वयंभू संत श्रीश्री रविशंकर जैसों को भी समय रहते समझना चाहिए, जो सर्व-स्वीकार्य ‘ईश-जन’ होने के चक्कर में मकबूल फिदा हुसैन की तरफदारी कर रहे हैं। मकबूल फिदा जरूर आएं हिंदुस्तान, पर उन्हें अपने कृत्यों के लिए भारतीयों से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी ही होगी। डैनिश कार्टूनिस्ट कर्ट वेस्टरगार्ड को घटना के बाद अब तक छुप कर रहना पड़ रहा है। मकबूल फिदा हुसैन जैसे लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ में आनी चाहिए। सम्मान और प्रतिष्ठा का मसला परस्पर होता है न...

जब बामियान में तालीबान बुद्ध की प्रतिमाएं बमों से उड़ा रहे थे, बौद्ध विद्वान डॉ. धम्मानंद ने कहा था, ‘अफगानिस्तान में जो बुद्ध की प्रतिमाएं नष्ट कर रहे हैं, उस पर हम नाराज क्यों हों? यह उनकी परेशानी है कि वे इतने ही निरे मूर्ख हैं कि इतिहास और धार्मिक आस्था की बात तो छोड़िए, पत्थर की खूबसूरत नायाब मूर्तियों को तोड़ कर बदसूरती का मलबा बिखेर रहे हैं। इसी तरह हिंदू देवी की नंगी तस्वीरें बना कर फिदा हुसैन हिंदू संस्कृति का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। हुसैन जैसे लोगों को यह बात क्यों नहीं समझ आती कि वे क्या सरस्वती और भारत माता की तरह अपनी मां, बहन या पत्नी की तस्वीरें बना कर उसका सार्वजनिक प्रदर्शन कर सकते हैं? हुसैन इसका जवाब हां में दे सकते हैं... लेकिन इससे सस्ती और ओछी बात और क्या हो सकती है।’

यदि हम अपना सम्मान करते हैं तो प्रकृति के एक-एक सृजन का सम्मान करना हमारा दायित्व है। अन्यथा प्रकृति खुद ब खुद परिवर्तन का चक्र चला कर असम्मानितों का सम्मान स्थापित कर देती है...

(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) March 20, 2010 Issue under – सम्पादकीय)