शनिवार, 11 दिसंबर 2010

कला में पैठ और कलात्मक बलात्कार

डॉ.लाल रत्नाकर

अब आमजन और खास जन की कला का भेद बहुत साफ तौर पर नज़र आने लगा है, आमजन की कला में व्यवसयिकता ने कला नियमों व मान्यताओ की सारी सीमाओं का उल्लंघन कर दिया है यदि कुछ भी साफ सुथरा कहीं हो सकता है तो वह है बाज़ार से सुदूर गाँव के वे लोग जिन्हें आज की व्यवसयिकता ने अभी अपने आगोश में नहीं लिया है.क्योंकि बाजार का विकृत रूप वहां नहीं पहुंचा है। जब जब कला पर विचार की बात आती है तो हमारे सामने  और कला समाज के सामने वही गिने चुने नामचीन लोग जिन्हें न जीवन की और न ही रचना की तकनीक का कोई ज्ञान है परंतु उन्हें उनकी जानकारी ही बड़ी लगती है.  तकनीक तो तब भी थी जब कला सामग्री के लिए कलाकार प्रकृति के अवदानों पर आश्रित था। पर तब और अब में फर्क इतना ही हुआ है की तब रचना के मायने देशज प्रक्रिया के थे पर अब तो वैश्विक सरोकार खड़े है, कला पहचानी ही जाती है अपनी देशज मान्यताओं, प्रतीकों, तकनीकियो (विधियों) से 'न' की नकली मृग्मरिचिकाओं से।आज का बौद्धिक समाज जितने गूढ़ संसर्गों के साथ कला पर काबिज होने का दंभ भर रहा है वह मूलतः कलात्मक प्रवृतियो पर ही नहीं पुरे उस समाज पर हमला है जिसे वह विस्थापित करना चाहता है, जबकि पहले ऐसा नहीं था। साथ ही साथ एक बड़ी साजिश के साथ भी इसमे बाज़ार कम सामाजिक व्यभिचार ज्यादा ही है. यद्यपि व्यभिचार अटपटा लग सकता है पर यदि इस पर विचार किया जाय तो स्पष्ट रूप से यह स्थितियां नज़र आएँगी यहाँ हमारी यही कोशिश है कि साफ और स्पष्ट तौर पर इस अवधारणा पर बात की जाये ;-

आजादी के बाद विविध क्षेत्रों में विकास की जो अवधारणाएं बनाई गयीं और उसमें जो फौज आई वे कौन थे। इन तमाम कला आन्दोलनों के लिए या उनके विकास के लिए, जिनमे अनेकों संस्थाए खड़ी की गयी उनके उद्येश्य अवश्य पवित्र रहे होंगे, जिनके मन में ये विचार आये होंगे की हमें साहित्य संगीत और ललित कलाओं के उत्थान पर काम करना है. पर हुआ क्या और आज क्या हो रहा है. यही कारण था की इनके विकास के लिए अकादमियां स्थापित की गयी थी, जिसमे यहाँ हम विशेष सन्दर्भ ले रहे है ललित कला अकादमी नई दिल्ली का. आंकणों का लेखा जोखा निकाला जाय तो यह बात प्रकाश में आती है कि कला को बढ़ाने की बजाय अपनो अपनों को बढ़ाने की प्रवृति ने पूरे कला जगत में एक वह वर्ग खड़ा कर दिया जो केवल और केवल किसी न किसी दबाव या प्रभावशाली लोगों के समीकरण पर कड़ी हुयी, यद्यपि यह दृष्टि मेरी ही नहीं कई बड़े और कुशल कलाकारों की भी है जिनका मानना है की वहां कला और कलाकार की पूंछ नहीं होती ग्रुप की होती है, यथा बदौड़ा तो बड़ोदा कोलकाता तो कोलकाता पंजाबी तो पंजाबी पर इनके बीच जो सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व होता है वह है 'ब्राह्मण' कलाकार है या नहीं यदि ब्रह्मण है तो चलेगा, जिसका अब इतना असर हो गया है की यदि आप इसके खिलाफ आवाज़ उठाते है तो आप को कला विरोधी और अ कलाकार घोषित कर दिया जायेगा. विरोध के स्वर कई बार उठे पर सारी सामाजिक इकाइयों की तरह इस विरोध का नेतृत्व भी अंततः ब्राहमण ले लेता है और धीरे धीरे सारी लड़ाई/ विरोध ही बंद हो जाता है.

यहाँ यह सवाल उठाना बेमानी ही होगा की देशज कलाकारों की क्या गति हुई फिर जवाब की लड़ी राष्ट्रीय कला संग्रहालय आधुनिक कला संग्रहालय इतना ही नहीं क्राफ्ट म्यूजियम आदि आदि. कुल मिलकर इतना घाल-मेल की पूरी अवाम इसी में गोते खाती रही और कला की कलाकारी उनसे चलती रहे आज इस पूरे प्रोसेस में वास्तविक कलाकार की जगह कहाँ है खोजनी पड़ेगी पर इसकी खोज के लिए भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय निरंतर काम कर रहा है पर आज तक उसकी तलास कहाँ पहुंची है यह एक अलग शोध का सवाल है .

दूसरी ओर विविध प्रकार के कला संस्थान और उनके प्राध्यापक जिन पर बड़ी जिम्मेदारी थी कला के विकास की पर इन्होने राष्ट्रीय धारा का सहारा लिया और बड़ी सिद्दत से कला उत्थान में जम गए "मुझे याद है एक बार मेरे एक मित्र ने कला पर एक आलेख खासकर जिस विश्वविद्यालय में हम लोग है पर लिखने का आग्रह किये मै बड़े उत्साह में बगैर भेदभाव के लिख दिया 'वहां के कला विषय की कुशलता पाठ्यक्रम की सारगर्भिता गौरवपूर्ण पारदर्शिता ५५ वर्षों का कला उत्थान गलती से या व्यस्तातावश बगैर उनकी सम्पादकीय कुतर छांट के छप गया .छपने की प्रक्रिया में कई त्रुटियाँ अलग तरह की थी जो अशोभनीय थीं पर काफी दिनों बाद मेरे मित्र की शिकायत थी वह कोई लेख था वह, वह तो पत्रकार जैसी रिपोर्टिंग थी जबकि वहीँ पर उनके आलेखों में प्रशंसा के आलावा सच का कहीं नामों निशान नहीं कमोवेश यही हाल कलाओं के शोध लेखन एवं उनकी तकनीकियों के मामले में दिखाई देता है.

कई एसे साहित्य कला पर पुस्तकाकार रूप में आये है जिनमे इतनी गलत जानकारियां है, इतने अशोभनीय और सिद्धान्तहीन रेखांकन है जिनका सरासर अनुकरण पूरे परिक्षेत्र में चल रहा है, एक विदुषी तो येसी भी है जिनको कला न तो विरासत में मिली और न ही कला का कोई अध्ययन जिसका कोई लेना देना नहीं है पर देश का हर आदमी उस कला को लेकर बहस पर बहस किये जा रहा है, जहाँ कला नदारद है और साहित्य ने सारा ठेका लेकर गुणगान किये जा रहा है की नग्नता नहीं है, कला में कुछ भी नंगा नहीं होता, निर्वस्त्रता तो कला को उन्नत करती है, यह भी अजीबो गरीब कहानी है जहाँ न अनुपात है और न ही शारीर सौष्ठव पूरा का पूरा साम्राज्य नक़ल की पराकाष्ठा को पार कर रहा है जहाँ शुद्ध रूप से जातीय अहंकार और उसकी प्रशंशा की गयी है क्योंकि जितने वाह वाह हुए है उसमे कहीं कला की समझ नज़र नहीं आती है .

दुनिया भर में कला संग्रहालय है उनमे जिनकी कलाएं है उनकी चर्चा होती है आजकल वही चलन हिंदुस्तान में भी हो गया है पर उनकी कलाओ का कोई लेखा जोखा उनकी गुणवत्ता से नहीं है जिनके कारन वह संगृहीत की जानी चाहिए वह नहीं है जो संग्रहित है उनका स्थान हमारी योग्यताओं तथा तिकड़म की बौद्धिकताओ पर आधारित है (एसा भी नहीं की जो वाजिब कृतियाँ है उनका संग्रहण नहीं है पर जब कला दर्शक तमाम रचनाओं से आगे बढ़ जाता है), यथा कलादीर्घा में कला की जगह एक वर्ग ने बना ली है जिसका खामियाजा यह हो रहा है की पूरे संग्रहालय उन्ही को तब्बज्जो दे रहे है जो उनके इर्द-गिर्द घूम रहे हैं, एसी स्थिति में कलाएं कम और तिकड़म ज्यादा प्रभावी हो रहे है. यदि इनकी यही गति रही तो ये संग्रहालय जनता के लिए न होकर खासजनो के आय के श्रोत के लिए ही रह जायेंगे. 


(क्रमशः)